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अभिव्यक्ति के ख़तरे तो होंगे ही !

     डॉ लक्ष्मण यादव की 'प्रोफेसर की डायरी' एक ऐसा दस्तावेज है जो उच्च शिक्षा की उस अनकही कहानी को कहता है, जिसमें शोषण के शिकार तो अधिकांशतः है लेकिन कोई उसे कहने का जोखिम नहीं उठा पाते। इस डायरी को पढ़ते हुए सबसे पहले मुक्तिबोध की यह पंक्तियाँ बरबस जहन में आ जाती हैं -


"अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे।

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।"



     डॉ लक्ष्मण आजमगढ़ के एक किसान परिवार में जन्मे तथा इलाहाबाद व दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। वें दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में चौदह वर्षों तक एडहॉक प्रोफेसर रहे। सवालों से घबराने वाली सत्ताओं से वे डरे नहीं। डॉ लक्ष्मण यादव ने अभिव्यक्ति के उस खतरे को उठाया जिसे रोहित वेमुला ने उठाया था और सांस्थानिक हत्या का शिकार हुआ । परिणामतः सत्ताओं द्वारा ठेके पर प्रोफेसर का ठेका बंद करा दिया गया यानि डॉ लक्ष्मण यादव को अभिव्यक्ति की सजा दे दी गयी, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया ।


     यह अपने तरह की पहली पुस्तक है। इस पुस्तक को पढ़ने के लिए युवाओं के अन्दर एक अलग ही जोश है। जोश इतना कि अमेज़ान पर प्री बुकिंग में ही यह पुस्तक बेस्टसेलर बन गई और बेस्टसेलर के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए। प्रोफेसर की डायरी का प्रथम संस्करण 8 फरवरी 2024 को प्रकाशित हुआ तथा फरवरी में ही चार संस्करण प्रकाशित हो गए। पुस्तक का पांचवा संस्करण 34 दिन पर आया और 34,000 प्रतियाँ बिक गई।



    इस पुस्तक को 'फिक्शनल डायरी' के रूप में प्रकाशित किया गया लेकिन यह 'नॉनफिक्शनल' है क्योंकि इसमें महज कुछेक व्यक्तियों के नाम भर बदल दिए गए हैं बाकी शैक्षणिक संस्थानों की हालत व सामाजिक - राजनीतिक परिस्थितियाँ एकदम वास्तविक हैं। पुस्तक के कार्यव्यापार की योजना 'प्रतीयमान' है।


    यह पुस्तक एडहॉक प्रोफेसरों की बदहाल स्थिति को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। यह कहानी केवल डॉ लक्ष्मण की ही नहीं है बल्कि देश के तमाम विश्वविद्यालयों, कॉलेजों व स्कूलों के अस्थायी शिक्षकों की बेबसी की है। यह कहानी अपर्णा जैसी महिला एडहॉक की भी है, जिसे माँ बनने के लिए अपनी नौकरी छोड़ना पड़ी। यह कहानी विमला जैसी एडहॉक की भी है जिसे परमानेंट करने के लिए उसका टी.आई.सी. (विभागाध्यक्ष) अपने साथ एक रात सोने का घृणित प्रस्ताव रखता है। यह कहानी विवेक जैसे उन रिसर्चर की है जिन्हें यह व्यवस्था दिहाड़ी हेल्पर या फैमिली सर्वेण्ट बन जाने पर मजबूर कर देती है।


    दरअसल यह कहानी उन मेहनतकश वर्गों की नई पीढ़ी की है जो छोटे- बड़े शहरों, कस्बों के कॉलेजों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों में शोषण का शिकार हो रहे हैं। वस्तुतः यह डायरी वर्ग - चेतना की कहानी है, जिसका प्रतिपाद्य 'एडहॉकिज्म का सिस्टम युवाओं के साथ मजाक' है।



     डॉ लक्ष्मण किसान परिवार से सम्बन्ध रखते हैं सम्भवतः इसीलिए प्रतीक व बिम्ब अधिकतर खेत-खलिहानों और किसानी का ही लेते हैं। वें किसान व बेरोजगार में सम्बन्ध भी दर्शाते हैं - "किसान व बेरोजगार दोनों को पता होता है कि जरूरी नहीं कि हर बार फसल अच्छी ही हो" परन्तु लहलहाती फसल की उम्मीद में किसान अपना सब कुछ खेती में छोंक देता है। उसी प्रकार बेरोजगार अपनी इस जहालत भरी जिंदगी से मुक्ति की उम्मीद में कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है। इस पुस्तक को पढ़कर मुझमें उन अस्थायी शिक्षकों के प्रति संवेदना जागृत हो गयी जिन्हें मैं प्रशासन का चापलूस मानकर जिनके प्रति हीन भावना से भर जाता था ।


     उच्च शिक्षा में जाति के आधार पर हमेशा भेदभाव होता रहा है। लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से विश्वविद्यालयों में जाति के प्रश्न को रेखांकित किया है। यह पुस्तक उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाती है जो लगातार जातिगत भेद‌भाव करती चली आ रही है - "कौन थे वें लोग, जो सैकड़ों एससी एसटी ओबीसी सीटों को खा गये ? कौन थे वें लोग जो लगातार आरक्षित सीटों पर एनएफएस करते रहे?" (पृष्ठ-129)


    लेखक छात्रसंघ की अहमियत को समझता है तथा स्पष्ट मानता है कि "एक विविधतापूर्ण लोकतंत्र के लिए छात्रसंघ राजनीति की नर्सरी होते हैं। मगर इसे जानबूझकर बंद या बर्बाद किया जा रहा है।” (पृ. 134) अक्सर विद्यार्थियों और शिक्षकों को बोला जाता है कि उन्हें राजनीति से दूर रहना चाहिए । दिलचस्प बात यह है कि यह वें बोलते हैं जो स्वयं राजनीति करते हैं। लेखक राजनीति की जरूरत से पाठकों को रूबरू करता है - "क्या एक नागरिक का फर्ज़ नहीं बनता कि वह गलत को गलत कहे ? और गलत को गलत कहना अगर राजनीति है तो इतनी राजनीति आपको भी करनी चाहिए।” (पृष्ठ-127)


    लेखक इस डायरी के माध्यम से सत्ता की साजिश को उजागर करता है। सत्ताएँ हमेशा स्वयं बचने के लिए प्रजा-प्रजा के बीच संघर्ष कराती रही हैं। जब लक्ष्मण यादव समेत डूटा (डीयू के शिक्षकों की ट्रेड यूनियन) के अन्य साथियों समेत डीयू कुलपति के खिलाफ प्रदर्शन करने जाते हैं, तब यह सत्ता ठेके पर प्रोफेसरों के आंदोलन को रोकने के लिए, ठेके पर रखे गए सिक्योरिटी गार्ड्स को हथियार बनाती है।


    इलाहाबाद विश्वविद्यालय लेखक की उच्च शिक्षा का पहला विश्वविद्यालय है। लेखक का मानना है कि इसी ने उन्हें गढ़ा है और इसी ने उन्हें पंख लगाकर उड़ना सिखाया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का जिक्र होते ही लेखक 'नोस्टाल्जिया' से ग्रस्त हो जाता है। पुस्तक की शुरुआत में लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अन्य विश्वविद्यालयों से तुलना करने लगता है और इ० वि० को हर मुद्दों पर श्रेष्ठ मानता है। लेखक देश के तमाम विश्वविद्यालयों की ऐसी घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख करता है जिसमें विद्यार्थियों के साथ अन्याय अथवा उनका शोषण हो रहा है। परन्तु इ० वि० की ऐसी किसी भी घटना का जिक्र नहीं किया गया है सिवाय गुणगान के। क्या इस विश्वविद्यालय में 'सब चंगा-सी' है! या इसे अपने पुराने आशियाने के प्रति मोहग्रस्तता समझा जाए अथवा कुछ और?


   पुस्तक के अंत तक आते-आते ऐसा लगता है जैसे इसका संकलन बड़ी हड़बड़ी या जल्दबाजी में किया गया है। इसी कारण पुस्तक के अंत में घटना का समयांतराल अपेक्षाकृत जल्दी-जल्दी बढ़ता है। मसलन 14 अगस्त 2020 की घटना के बाद सीधे सितम्बर 2023 की घटना का जिक्र किया गया है और अप्रैल 2023 की घटना का जिक्र सितम्बर 2023 के बाद किया गया है।


    भाषा बहुत ही सरल है। अधिकतर बातें लोक अथवा ग्रामीण समाज के अनुभवों के माध्यम से कही गयी है इसलिए भी भाषा की सहजता व जीवंतता इसकी उपलब्धि है।


    डॉ लक्ष्मण यादव ने अपनी इस डायरी के माध्यम से एक केन्द्रीय प्रश्न को उठाया है - कैंपस डेमोक्रेसी' का । वें एक बेहतर दुनिया बनाना चाहते हैं, जिसके लिए वें लोकतांत्रिक कैंपस का होना अनिवार्य मानते हैं। उस ध्येय हेतु वें लगातार संघर्ष करते हैं। वें डूटा के सहयोग से कई आंदोलन करते हैं। कई आंदोलनों में सफल भी होते हैं। लेकिन जब उन्हें व उनके जैसे तमाम शिक्षकों को उनके पदों से हटा दिया जाता है तब पाठक अभिव्यक्ति के खतरे को पूर्णतः भाँप सकते हैं। यह डायरी अकादमिक दुनिया में सफलता की उम्मीद करने वाले विद्यार्थियों को अंदर से डरा भी सकती है और उन्हें अन्याय का प्रतिरोध करने का साहस भी देगी।


    यह पुस्तक हमें देश के तमाम विश्वविद्यालयों की वास्तविकता से रूबरू कराती है। लेकिन मेरे एक सवाल का जवाब यह भी नहीं दे पाती - 'आखिर ! ये विश्वविद्यालय विष का विद्यालय बनने कब बंद होंगे? कब होगी फ्री कैम्पस डेमोकेसी? कब नहीं होंगे खतरे अभिव्यक्ति के?"


"जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे

मारे जाएँगे

कटघरे में खड़े कर दिए जाएँगे, जो विरोध में बोलेंगे

जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे

××

धकेल दिए जाएँगे कला की दुनिया से बाहर, जो चारण नहीं

जो गुन नहीं गाएँगे, मारे जाएँगे।"

- राजेश जोशी




पुस्तक की सामान्य जानकारी

  • पुस्तक- प्रोफेसर की डायरी
  • लेखक - डॉ लक्ष्मण यादव
  • प्रकाशक - अनबाउंड स्क्रिप्ट
  • प्रकाशन - 8 फरवरी 2024
  • कुल पृष्ठ - 159
  • मूल्य - ₹249



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