Skip to main content

अस्पृश्यता : उत्तरदायी कौन?

          देश में आज भी छूआछूत जैसी कुरीतियां समाज में बनी हुई है। देश के कई हिस्‍सों से रोज़ाना दलित उत्‍पीड़न (Dalit Atrocities) की घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें पिछड़े समुदायों के साथ अमानवीय, हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। भारतीय संविधान (Indian Constitution) में छूआछूत को बड़ा अपराध घोषित किया गया है। ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बाबासाहेब डॉ. बीआर अंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) ने शोषित, वंचितों को उनके अधिकार दिलाने और छूआछूत जैसी कुरीति को दूर करने के लिए इस बात पर जोर दिया था, क्‍योंक‍ि दलित समुदाय से होने और बचपन से इसका दंश झेलने के कारण वह भली भांति जानते थे कि अस्‍पृश्‍यता के कारण दलितों को क्‍या क्‍या दर्द झेलना पड़ता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 (Article 17 of Indian Constitution in Hindi) अस्पृश्यता का अंत (Abolition of Untouchability) करता है। संविधान के इस अनुच्छेद के जरिये अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध है। इसके अनुसार, ‘अस्पृश्यता’ (Untouchability) से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा। 

          यह व्यक्ति मप्र के छतरपुर जिले का निवासी धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री है, यह खुद को धर्म का ठेकेदार बताता है, यह धर्म की परिभाषा तक नहीं जानता यह अलग बात है। 

          मैं जानना चाहता हूँ कि यह अस्पृश्यता कौन सिखाता है या ऐसा विचार किसी के मन में कैसे आता है?

जिस देश के सबसे बड़े पद पर सुशोभित महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी एक दलित परिवार से आते हों, जिस देश का संविधान खुद अस्पृश्यता का अंत करता हो (Article 17 Abolition of Untouchability), जो देश सभी को 'विश्व-बंधुत्व' का विचार देता हो उस देश में किसी व्यक्ति के साथ छुआछूत जैसा व्यवहार करने की हिम्मत कैसे हो सकती है? 

          तुम बहुत बड़े मूर्ख हो और तुमसे भी बड़ा मूर्ख वह है जो तुम्हारी चरण-वंदना करता है। क्योंकि तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूँ जिस व्यवसाय से तुम्हारी रोजी-रोटी चलती है, उस व्यवसाय का निवेशक और ग्राहक  वही व्यक्ति है, तात्पर्य यह है कि "धर्म एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें निवेशक और ग्राहक एक ही होते हैं।" और यदि तुम्हें बिजनेस-सेंस भी होता तो तुम ऐसा कदापि ना करते, तुमने तो संविधान का भी उल्लंघन करके रख दिया, जो एक दंडनीय अपराध है। मुझे समझ नहीं आता  इसे इस बात का किंचित भय तक क्यों नहीं है। 

        यह वही व्यक्ति है जो कुछ दिनों पहले हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए एक समुदाय विशेष के घरों को गिराने की तरफ इशारा करते हुए बुलडोजर खरीदने के लिए बोल रहा था।

        इस व्यक्ति के द्वारा किया गया ऐसा अपमानजनक व्यवहार देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है यह कृत्य असंवैधानिक तथा दंडनीय अपराध है। इस देश के संविधान में विश्वास रखते हुए मैं आशा करता हूं कि इस व्यक्ति पर अतिशीघ्र व कठोरतम कार्यवाही की जाएगी।

Comments

  1. यह मूर्ख ही है सर

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपना 137वां स्थापना दिवस मना रहा है। हाँ, वही विश्वविद्यालय जिसे 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसे 'IAS की फैक्ट्री' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसे 'साहित्य तथा राजनीति का गढ़' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसने इस देश को जाकिर हुसैन, डॉ शंकर दयाल शर्मा जैसे राष्ट्रपति, चंद्र शेखर, गुलजारी लाल नंदा तथा ‌विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे प्रधानमंत्री और 6 मुख्यमंत्री दिए। वही विश्विद्यालय जिसने डॉ रामकुमार वर्मा, धर्मवीर भारती, हरिवंशराय बच्चन, दूधनाथ सिंह, महादेवी वर्मा, फ़िराक़ गोरखपुरी, भगवती चरण वर्मा तथा चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जैसे साहित्यकार दिए। वही विश्वविद्यालय जिसने सैकड़ों ख्यातिलब्ध न्यायाधीश, वैज्ञानिक व शिक्षाविद दिए।             तो कुछ इस प्रकार है हमारे विश्वविद्यालय का ख्यातिलब्ध व गरिमामयी इतिहास, परंतु क्या इन उपलब्धियों की वोट में आज के यथार्थ को छुपाया जा सकता है? क्या इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की प्रशासनिक दायित्वबोध की कमी से उत्पन्न समस्याओं को छुपाया जा सकता है?    ...

अभिव्यक्ति के ख़तरे तो होंगे ही !

     डॉ लक्ष्मण यादव की 'प्रोफेसर की डायरी' एक ऐसा दस्तावेज है जो उच्च शिक्षा की उस अनकही कहानी को कहता है, जिसमें शोषण के शिकार तो अधिकांशतः है लेकिन कोई उसे कहने का जोखिम नहीं उठा पाते। इस डायरी को पढ़ते हुए सबसे पहले मुक्तिबोध की यह पंक्तियाँ बरबस जहन में आ जाती हैं - "अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।"      डॉ लक्ष्मण आजमगढ़ के एक किसान परिवार में जन्मे तथा इलाहाबाद व दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। वें दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में चौदह वर्षों तक एडहॉक प्रोफेसर रहे। सवालों से घबराने वाली सत्ताओं से वे डरे नहीं। डॉ लक्ष्मण यादव ने अभिव्यक्ति के उस खतरे को उठाया जिसे रोहित वेमुला ने उठाया था और सांस्थानिक हत्या का शिकार हुआ । परिणामतः सत्ताओं द्वारा ठेके पर प्रोफेसर का ठेका बंद करा दिया गया यानि डॉ लक्ष्मण यादव को अभिव्यक्ति की सजा दे दी गयी, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया ।      यह अपने तरह की पहली पुस्तक है। इस पुस्तक को पढ़ने के लिए युवाओं के अन्दर एक अलग ही जोश है। जोश इतना...

खुद से अनजान 'वो'

        रोड़ से आती गाड़ियों की सनसनाहट, अधेंरे में झींगुरों की झनझनाहट, कान में गुनगुनाते मच्छरों की भनभनाहट के बीच आधी रात को छत पर लेटा अपनी महिला मित्र से बात करने के बाद सुबह जल्दी जग कर लाइब्रेरी जाने की फिराक में लेटा वो। नींद का कुछ अता - पता नहीं, बार - बार करवटें बदलकर कर सोने की कोशिश में प्रयत्नशील...        हालाँकि वो रोज यही सोंच के सोता है कि सुबह जल्दी जगना है, यह अलग बात है कईयों बार जगाने के बाद भी दोबारा सो जाता है, फिर जब महिला मित्र गुस्सा होती है तो मनाता है, दुलराता है।       मगर आज यह क्या उसके आँखों में आँसू थे, पर आज उसकी लड़ाई नहीं हुई थी, रोज रात तो वो अपनी प्राणप्रिया से मनभावक, रंगीली, चुटीली बातें करके सो जाता था। कभी - कभी तो फोन चलते - चलते ही सो जाया करता था। पर आज उसकी नींद कहाँ थी....!