डॉ लक्ष्मण यादव की 'प्रोफेसर की डायरी' एक ऐसा दस्तावेज है जो उच्च शिक्षा की उस अनकही कहानी को कहता है, जिसमें शोषण के शिकार तो अधिकांशतः है लेकिन कोई उसे कहने का जोखिम नहीं उठा पाते। इस डायरी को पढ़ते हुए सबसे पहले मुक्तिबोध की यह पंक्तियाँ बरबस जहन में आ जाती हैं - "अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।" डॉ लक्ष्मण आजमगढ़ के एक किसान परिवार में जन्मे तथा इलाहाबाद व दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। वें दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में चौदह वर्षों तक एडहॉक प्रोफेसर रहे। सवालों से घबराने वाली सत्ताओं से वे डरे नहीं। डॉ लक्ष्मण यादव ने अभिव्यक्ति के उस खतरे को उठाया जिसे रोहित वेमुला ने उठाया था और सांस्थानिक हत्या का शिकार हुआ । परिणामतः सत्ताओं द्वारा ठेके पर प्रोफेसर का ठेका बंद करा दिया गया यानि डॉ लक्ष्मण यादव को अभिव्यक्ति की सजा दे दी गयी, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया । यह अपने तरह की पहली पुस्तक है। इस पुस्तक को पढ़ने के लिए युवाओं के अन्दर एक अलग ही जोश है। जोश इतना...