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नारी वस्तु नहीं मनुष्य

     


         आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं तो आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं और यदि अब आप एक महिला को शिक्षित करते हैं तो आप एक पीढ़ी को शिक्षित करते हैं।

          गौरतलब है कि प्राचीन काल से ही भारतीय व पश्चिमी सभी सभ्यताओं व सभी धर्मों में नारियां भेदभाव का शिकार रही हैं । कदाचित वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति आज से बहुत अधिक सुदृढ़ थी, हालांकि यह भी शोध का विषय हो सकता है। खैर हम बात करते हैं आधुनिक काल की यहां तक कि जब विश्व का प्रथम लोकतंत्र अमेरिका आजाद हुआ तो उसने भी महिलाओं को मत का अधिकार नहीं दिया। 1860 ई. के बाद इंग्लैंड में महिलाओं का एक समूह तेजी से उभर कर आया जिन्हें 'मताधिकारवादी' या 'Sufferagist' कहा गया। उनकी मांग थी कि पुरुषों के समान उन्हें भी मताधिकार दिया जाए। बीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिका और यूरोप में आंदोलन चरम स्तर पर था। तब जाकर कहीं 1918 में ब्रिटेन और 1920 में संयुक्त राज्य अमेरिका में महिलाओं का मताधिकार दिया गया।

          इस पितृसत्तात्मक समाज द्वारा नारी को सदैव पुरुष पर निर्भर दिखाया गया है, उसका शोषण किया है परंतु दुखद बात यह है कि शोषक वर्ग को शोषण का बोध ही नहीं हो पाता और उससेे भी दुखद बात यह है कि एक शोषक का शोषण यदा-कदा स्वयं एक शोषक के द्वारा भी किया जाता है । उदाहरणार्थ एक सास (नारी) द्वारा एक बहू (नारी) का शोषण । परिस्थिति इसके विपरीत भी हो सकती है।

           नारी मुक्ति का विचार तो 18वीं शताब्दी में उभरना शुरू हुआ जब अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान उदारवादियों ने समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व की आवाज उठाई। 1790 के दशक में फ्रांस की रिपब्लिकन क्रांति के दौरान Marie Gouze ने ' महिला अधिकार घोषणा पत्र' प्रकाशित किया किंतु इस पितृसत्तात्मक समाज को यह बात नहीं पच सकी व फ्रांस की क्रांतिकारी सरकार भी नारी मुक्ति की इस मांग को स्वीकार नहीं कर सकी यहाँ तक कि बाद में मैरी गूज़ को 'नारी के आदर्श गुण भूल जाने' के अपराध में मृत्युदंड दे दिया। 

          हमारे देश भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही पुरुषों के समान महिलाओं को भी वयस्क मताधिकार प्राप्त हो गया लेकिन प्रश्न यह उठता है क्या मताधिकार मिल जाने से महिलाओं को संपूर्ण अधिकार प्राप्त हो गए?

         महिलाओं को मताधिकार प्राप्त होना मात्र औपचारिक समानता है , तात्विक नहीं। चार-पांच वर्षो में मिलने वाले मताधिकार को छोड़ दें तो उनके वास्तविक जीवन में कोई परिवर्तन ही नहीं आया। महिलाओं की मूल समस्या 'स्त्रीत्व' कि वह धारणा है जिसके अनुसार यह माना जाता है कि महिला को सुरक्षा व आनंद घर के भीतर ही मिलता है जबकि सच यह है कि कोई भी स्त्री लगातार घर में बंद रहकर निराशा व कुंठा ही महसूस करती है। जिस तरह पुरुषों को व्यक्तिगत जीवन में अधिकार मिलते हैं वैसे ही उन्हें भी मिलने चाहिए। 

        Mary Wollstonecraft अपनी पुस्तक 'विंडिकेशन ऑफ़ द राइट्स आफ विमेन' मैं कहती हैं की स्त्रियों को मानव होने के नाते वह सभी अधिकार मिलने चाहिए जो पुरुषों को मिलते हैं उनका दावा था कि यदि महिलाओं को उचित शिक्षा मिल जाए व उसे भी तार्किक प्राणी मान लिया जाए तो लैंगिक अंतर स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे।

        नारी को देवी कहकर भी उसका शोषण करने वालों ध्यातव्य रहे नारी वस्तु नहीं है, नारी वह कारक है जिसके कारण ही तुम इस धरा पर उपस्थित हो।

        इस बार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2022 की थीम ‘जेंडर इक्वैलिटी फॉर ए सस्टेनेबल टुमारो’ यानी एक स्थायी कल के लिए आज लैंगिक समानता है।

        अतः हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपनी भेदभावकारी परंपराओं, रूढ़ियों व पितृसत्तात्मक मानसिकता को समाप्त कर एक सजग, समान, स्वस्थ व समृद्ध समाज की स्थापना करें।


        - अरुण 'प्रकाश'

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