Skip to main content

रंगभरी होली

         जिस प्रकार होली का महत्व रंगो की विविधता से है उसी प्रकार हमारे राष्ट्र का महत्व जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय, भाषा, संस्कृति, स्थलाकृति की विविधता से है।


विविधता में एकता, है हिन्द की विशेषता

         हमारी विशेषता यही है कि हमारे देश में विभिन्न असमानताओं के बावजूद भी अखंडता का अस्तित्व निवास करता है।

         हमें अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि हम हम अपनी विशेषता को बनाये रखें।



         होली का त्यौहार चल रहा है यह किसी धर्म विशेष का त्यौहार नहीं है यह प्रेम और सौहार्द का त्यौहार है, यह हम सभी भारतीयों का त्यौहार है।

ध्यातव्य रहे,

न तू हिन्दू, न ईसाई, न मुसलमान है

याद रहे सबसे पहले तू इंसान है

         हमारा यह कर्तव्य है कि प्रेम, सौहार्द व सामाजिक एकता बनाये रखें। 

         विविध रंगों की बोली से रंगभरी होली की हार्दिक शुभकामनाएं 🥳🥳

- अरुण 'प्रकाश'

Comments

Popular posts from this blog

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपना 137वां स्थापना दिवस मना रहा है। हाँ, वही विश्वविद्यालय जिसे 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसे 'IAS की फैक्ट्री' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसे 'साहित्य तथा राजनीति का गढ़' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसने इस देश को जाकिर हुसैन, डॉ शंकर दयाल शर्मा जैसे राष्ट्रपति, चंद्र शेखर, गुलजारी लाल नंदा तथा ‌विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे प्रधानमंत्री और 6 मुख्यमंत्री दिए। वही विश्विद्यालय जिसने डॉ रामकुमार वर्मा, धर्मवीर भारती, हरिवंशराय बच्चन, दूधनाथ सिंह, महादेवी वर्मा, फ़िराक़ गोरखपुरी, भगवती चरण वर्मा तथा चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जैसे साहित्यकार दिए। वही विश्वविद्यालय जिसने सैकड़ों ख्यातिलब्ध न्यायाधीश, वैज्ञानिक व शिक्षाविद दिए।             तो कुछ इस प्रकार है हमारे विश्वविद्यालय का ख्यातिलब्ध व गरिमामयी इतिहास, परंतु क्या इन उपलब्धियों की वोट में आज के यथार्थ को छुपाया जा सकता है? क्या इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की प्रशासनिक दायित्वबोध की कमी से उत्पन्न समस्याओं को छुपाया जा सकता है?    ...

अभिव्यक्ति के ख़तरे तो होंगे ही !

     डॉ लक्ष्मण यादव की 'प्रोफेसर की डायरी' एक ऐसा दस्तावेज है जो उच्च शिक्षा की उस अनकही कहानी को कहता है, जिसमें शोषण के शिकार तो अधिकांशतः है लेकिन कोई उसे कहने का जोखिम नहीं उठा पाते। इस डायरी को पढ़ते हुए सबसे पहले मुक्तिबोध की यह पंक्तियाँ बरबस जहन में आ जाती हैं - "अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।"      डॉ लक्ष्मण आजमगढ़ के एक किसान परिवार में जन्मे तथा इलाहाबाद व दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। वें दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में चौदह वर्षों तक एडहॉक प्रोफेसर रहे। सवालों से घबराने वाली सत्ताओं से वे डरे नहीं। डॉ लक्ष्मण यादव ने अभिव्यक्ति के उस खतरे को उठाया जिसे रोहित वेमुला ने उठाया था और सांस्थानिक हत्या का शिकार हुआ । परिणामतः सत्ताओं द्वारा ठेके पर प्रोफेसर का ठेका बंद करा दिया गया यानि डॉ लक्ष्मण यादव को अभिव्यक्ति की सजा दे दी गयी, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया ।      यह अपने तरह की पहली पुस्तक है। इस पुस्तक को पढ़ने के लिए युवाओं के अन्दर एक अलग ही जोश है। जोश इतना...

खुद से अनजान 'वो'

        रोड़ से आती गाड़ियों की सनसनाहट, अधेंरे में झींगुरों की झनझनाहट, कान में गुनगुनाते मच्छरों की भनभनाहट के बीच आधी रात को छत पर लेटा अपनी महिला मित्र से बात करने के बाद सुबह जल्दी जग कर लाइब्रेरी जाने की फिराक में लेटा वो। नींद का कुछ अता - पता नहीं, बार - बार करवटें बदलकर कर सोने की कोशिश में प्रयत्नशील...        हालाँकि वो रोज यही सोंच के सोता है कि सुबह जल्दी जगना है, यह अलग बात है कईयों बार जगाने के बाद भी दोबारा सो जाता है, फिर जब महिला मित्र गुस्सा होती है तो मनाता है, दुलराता है।       मगर आज यह क्या उसके आँखों में आँसू थे, पर आज उसकी लड़ाई नहीं हुई थी, रोज रात तो वो अपनी प्राणप्रिया से मनभावक, रंगीली, चुटीली बातें करके सो जाता था। कभी - कभी तो फोन चलते - चलते ही सो जाया करता था। पर आज उसकी नींद कहाँ थी....!