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अभिव्यक्ति के ख़तरे तो होंगे ही !

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय

आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपना 137वां स्थापना दिवस मना रहा है। हाँ, वही विश्वविद्यालय जिसे 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसे 'IAS की फैक्ट्री' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसे 'साहित्य तथा राजनीति का गढ़' कहा जाता था। वही विश्विद्यालय जिसने इस देश को जाकिर हुसैन, डॉ शंकर दयाल शर्मा जैसे राष्ट्रपति, चंद्र शेखर, गुलजारी लाल नंदा तथा ‌विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे प्रधानमंत्री और 6 मुख्यमंत्री दिए। वही विश्विद्यालय जिसने डॉ रामकुमार वर्मा, धर्मवीर भारती, हरिवंशराय बच्चन, दूधनाथ सिंह, महादेवी वर्मा, फ़िराक़ गोरखपुरी, भगवती चरण वर्मा तथा चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जैसे साहित्यकार दिए। वही विश्वविद्यालय जिसने सैकड़ों ख्यातिलब्ध न्यायाधीश, वैज्ञानिक व शिक्षाविद दिए।             तो कुछ इस प्रकार है हमारे विश्वविद्यालय का ख्यातिलब्ध व गरिमामयी इतिहास, परंतु क्या इन उपलब्धियों की वोट में आज के यथार्थ को छुपाया जा सकता है? क्या इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की प्रशासनिक दायित्वबोध की कमी से उत्पन्न समस्याओं को छुपाया जा सकता है?    ...

खुद से अनजान 'वो'

        रोड़ से आती गाड़ियों की सनसनाहट, अधेंरे में झींगुरों की झनझनाहट, कान में गुनगुनाते मच्छरों की भनभनाहट के बीच आधी रात को छत पर लेटा अपनी महिला मित्र से बात करने के बाद सुबह जल्दी जग कर लाइब्रेरी जाने की फिराक में लेटा वो। नींद का कुछ अता - पता नहीं, बार - बार करवटें बदलकर कर सोने की कोशिश में प्रयत्नशील...        हालाँकि वो रोज यही सोंच के सोता है कि सुबह जल्दी जगना है, यह अलग बात है कईयों बार जगाने के बाद भी दोबारा सो जाता है, फिर जब महिला मित्र गुस्सा होती है तो मनाता है, दुलराता है।       मगर आज यह क्या उसके आँखों में आँसू थे, पर आज उसकी लड़ाई नहीं हुई थी, रोज रात तो वो अपनी प्राणप्रिया से मनभावक, रंगीली, चुटीली बातें करके सो जाता था। कभी - कभी तो फोन चलते - चलते ही सो जाया करता था। पर आज उसकी नींद कहाँ थी....! 

अस्पृश्यता : उत्तरदायी कौन?

          देश में आज भी छूआछूत जैसी कुरीतियां समाज में बनी हुई है। देश के कई हिस्‍सों से रोज़ाना दलित उत्‍पीड़न (Dalit Atrocities) की घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें पिछड़े समुदायों के साथ अमानवीय, हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। भारतीय संविधान (Indian Constitution) में छूआछूत को बड़ा अपराध घोषित किया गया है। ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बाबासाहेब डॉ. बीआर अंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) ने शोषित, वंचितों को उनके अधिकार दिलाने और छूआछूत जैसी कुरीति को दूर करने के लिए इस बात पर जोर दिया था, क्‍योंक‍ि दलित समुदाय से होने और बचपन से इसका दंश झेलने के कारण वह भली भांति जानते थे कि अस्‍पृश्‍यता के कारण दलितों को क्‍या क्‍या दर्द झेलना पड़ता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 (Article 17 of Indian Constitution in Hindi) अस्पृश्यता का अंत (Abolition of Untouchability) करता है। संविधान के इस अनुच्छेद के जरिये अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध है। इसके अनुसार, ‘अस्पृश्यता’ (Untouchability) से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा, जो वि...

रंगभरी होली

         जिस प्रकार होली का महत्व रंगो की विविधता से है उसी प्रकार हमारे राष्ट्र का महत्व जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय, भाषा, संस्कृति, स्थलाकृति की विविधता से है। विविधता में एकता, है हिन्द की विशेषता          हमारी विशेषता यही है कि हमारे देश में विभिन्न असमानताओं के बावजूद भी अखंडता का अस्तित्व निवास करता है।          हमें अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि हम हम अपनी विशेषता को बनाये रखें।          होली का त्यौहार चल रहा है यह किसी धर्म विशेष का त्यौहार नहीं है यह प्रेम और सौहार्द का त्यौहार है, यह हम सभी भारतीयों का त्यौहार है। ध्यातव्य रहे, न तू हिन्दू, न ईसाई, न मुसलमान है याद रहे सबसे पहले तू इंसान है          हमारा यह कर्तव्य है कि प्रेम, सौहार्द व सामाजिक एकता बनाये रखें।           विविध रंगों की बोली से रंगभरी होली की हार्दिक शुभकामनाएं 🥳🥳 - अरुण 'प्रकाश'

नारी वस्तु नहीं मनुष्य

                 आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं तो आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं और यदि अब आप एक महिला को शि क्षित करते हैं तो आप एक पीढ़ी को शिक्षित करते हैं।           गौरतलब है कि प्राचीन काल से ही भारतीय व पश्चिमी सभी सभ्यताओं व सभी धर्मों में नारियां भेदभाव का शिकार रही हैं । कदाचित वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति आज से बहुत अधिक सुदृढ़ थी, हालांकि यह भी शोध का विषय हो सकता है। खैर हम बात करते हैं आधुनिक काल की यहां तक कि जब विश्व का प्रथम लोकतंत्र अमेरिका आजाद हुआ तो उसने भी महिलाओं को मत का अधिकार नहीं दिया। 1860 ई. के बाद इंग्लैंड में महिलाओं का एक समूह तेजी से उभर कर आया जिन्हें ' मताधिकारवादी ' या ' Sufferagist ' कहा गया। उनकी मांग थी कि पुरुषों के समान उन्हें भी मताधिकार दिया जाए। बीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिका और यूरोप में आंदोलन चरम स्तर पर था। तब जाकर कहीं 1918 में ब्रिटेन और 1920 में संयुक्त राज्य अमेरिका में महिलाओं का मताधिकार दिया गया।           इस पितृसत्तात्मक समाज द्वार...

महात्मा कबीर

      एक ऐसे महात्मा, समाजसुधारक, धर्मनिरपेक्षता के सबसे पहले झंडाबरदार, जिनके नाम का अर्थ ही है " महान " ऐसे महान सन्त के जन्म दिवस के पावन अवसर पर मैं कोटि - कोटि नमन करता हूँ। 🙏🙏       कबीर टीका लगाने वाले सन्त नही बल्कि समतावादी और मानवतावादी विचारधारा के प्रणेता थे।       संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ़ झलकती है। लोक कल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था। कबीर को वास्तव में एक सच्चे विश्व-प्रेमी का अनुभव था। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी। समाज में कबीर को "जागरण युग का अग्रदूत" कहा जाता है।            यह बात बिल्कुल सत्य है कि कबीर ने " जो सहा वो कहा "।         समाज में व्याप्त अन्धविश्वास पर कबीर ने करारी चोट की है - ‪ हिन्दुओं पर‬  " पाथर पूजे हरी मिले, ...